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Muskaan
Muskaan - a story by Rakesh Kumar Tripathi
बड़ी ख़ूबसूरत थी वह ! बड़ी-बड़ी आँखें थीं उसकी । बरबस अपनी ओर देखने को मजबूर करती आँखें । मैं उस स्टोर में घुसा ही था कि सबसे पहले मुझे उसकी आँखें दिखाई पड़ीं । थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि उसके होंठ मुस्कुरा रहे थे । आँखें मेरी ओर ही टिकी थीं । शायद मुस्कुराने की वजह से ही उसकी आँखें भी इतनी मोहक लग रही थीं । मैं उन आँखों को देखते हुए ही उस शोरूम में दाखिल हुआ और आगे बढ़ा । आगे बढ़ने के लिए लाजिमी था कि उन आँखों की ओर देखना छोड़ दूँ । लेकिन फिर देखता किस ओर ? इस स्टोर के अंदर तो मैं बस टाइम पास करने के लिए आया था । बाहर बड़ी गर्मी थी । सिर्फ़ गर्मी ही नहीं बल्कि अच्छी ख़ासी धूप थी । मेरी बीवी ने कहा था भारत माता चौराहे पर वाली रेड लाईट के पास खड़ा रहने के लिए । पता नहीं मैं पहले आ गया था या उसे आने में देर हो रही थी ! फ़ोन किया तो जल्दी में जवाब दिया रास्ते में हूँ । अब इससे ज़्यादा कुछ पूछना अक्लमंदी का काम नहीं था । मुझे पता था वह कहीं भी हो सकती थी - आधे घंटे से लेकर पाँच मिनट की दूरी पर । शादी के कुछ सालों के बाद कुछ सवाल और कुछ सवालों के जवाब बेमानी हो जाते हैं । यह भी उन्हीं चुनींदा सवालों-जवाबों में से एक था । मैंने थोड़ी देर और लाल बत्ती के पास इंतज़ार किया । थोड़ी सी इधर-उधर चहलकदमी की । पास से एक महिला छतरी लगाए गुज़री तो अहसास हुआ कि कितनी तेज़ धूप है ! इधर उधर नज़र दौड़ाई तो यह स्टोर दिख गया । पहले तो यहाँ एक सिनेमा हॉल हुआ करता था । मैं इस तरफ़ आया भी तो बहुत दिनों के बाद । वैसे पूरे शहर में पुरानी इमारतों के टूटने और उनकी जगह नई दुकानों-बाज़ारों का बनना कोई नई बात नहीं है । मुझे भी कोई बहुत ज़्यादा हैरत नहीं हुई । नया स्टोर था - डिपार्टमेंटल स्टोर ! सिनेमा हॉल का लगभग नीचे का पूरा हिस्सा उसमें समा गया था । ऊपर शायद सात-आठ मंज़िलें और बनी थीं, मैंने ग़ौर नहीं किया । तेज़ धूप से बचने के चक्कर में सीधा अंदर घुस आया और अंदर आते ही उन आँखों से टकरा गया ।
आपके साथ-साथ कहीं मेरी पत्नी भी यह कहानी पढ़ रही होगी तो शर्तिया मुझे लम्पट और चरित्रहीन समझने लगेगी । हालांकि थोड़ी देर लड़ने, झगड़ने, ताने देने के बाद पूछेगी भी कि क्या उसकी आँखें मेरी आँखों से भी ज़्यादा सुंदर थी और यह भी कहेगी कि तुम मर्द लोग शादी के कुछ साल बाद बदल क्यों हो जाते हो ! पत्नी जब मिलेगी तो उसकी अदालत में भी अपनी दलीलें रखूँगा । अभी मेरा कर्तव्य बनता है कि आपकी ग़लतफ़हमी दूर कर दूँ । आप मेरी कहानी के वर्तमान पाठक हैं । उन मोहक आँखों के आकर्षण का मेरे चरित्र के साथ कोई सीधा रिश्ता नहीं है । आप चाहें तो दूर का रिश्ता खोज-खाज कर भले निकाल लें । कैसे... वह बाद में बताता हूँ ।
मैं अक्सर दो-एक बार मिले हुए लोगों को भूल जाता हूँ, मतलब कि उनकी सूरतें तो जानी-पहचानी सी लगती हैं लेकिन ऐसा भी हुआ है कि नाम और संदर्भ को याद करने के चक्कर में मैं उधेड़बुन में खड़ा रहा हूँ और कुछ अजनबी बड़ी बेतकल्लुफ़ी से मुझसे मिलकर, कुछेक मेरे पैकेट से सिग्रेट हथिया कर मेरी पीठ पर धौल जमा कर भी चलते बने हैं और मैं ऊँगलियों में फँसी फ़िल्टर को दबाए सोचता खड़ा रह जाता हूँ कि बंदा था कौन ! कहते हैं बढ़ती हुई उम्र के साथ मस्तिष्क की अंदरूनी कोशिकाओं का भी क्षय होने लगता है । लेकिन अभी कौन सी उम्र हो रही है मेरी ! वैसे शहर की बदलती हुई आबोहवा ने और हवा में घुलते ज़हर ने उम्र पर अपना असर दिखाया तो ज़रूर है । उन मोहक आँखों को देख कर आगे बढ़ा तो शुरूआती पलों में यही ख़याल आ-जा रहा था कि इसे कहाँ देखा है, कहाँ मिला हूँ ! वह मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी । किसी परिचित की सी आत्मीयता से । आज से दस-पाँच साल पहले तक तो अच्छा ही लगता था जब कोई एक टक देखता था या हौले से मुस्कुरा देता था । दिल में उमंगों की हिलोरें उठने लगती थी । अब हिलोर तो नहीं उठती लेकिन झूठ क्या बोलूँ - दिल को छूकर एक ठंडी बयार ज़रूर एक पल में गुज़र जाती है । दिल मचलता नहीं, बहलता ज़रूर है । लेकिन यहाँ ना बहला, ना मचला, उलझ सा गया ।
मैंने शेल्फ़ से टोमैटो सॉस की एक बॉटल उठाई और बड़े ग़ौर से उस पर छपे इंग्रेटिएट्स की लिस्ट को पढ़ने लगा । लेकिन मेरा ध्यान किन्हीं और उपादानों की ओर था । कनखियों से उस ओर ताका तो उससे नज़रें मिल गईं । उसके चेहरे पर मुस्कान अब भी थी । मैंने सॉस की बोतल को रख दिया और आगे बढ़ गया । सोचा इस शेल्फ़ के छोर पर जाकर कोई सामान उठाकर पूरा घूमकर उसे देखूँगा और याद करने की कोशिश करूँगा । कहीं यह हमारी नई पड़ोसन तो नहीं ! या फिर माथुर साब की साली जो पिछली गर्मियों में पूरे एक महीने सामने वाली बाल्कनी में दिख जाया करती थी ।
शेल्फ़ के आख़िरी छोर पर डायपर्स के पैकेट रखे हुए थे । मैं हिचकिचाया - फिर सोचा मेरी उम्र का डायपर से क्या रिश्ता ! कई लोग देर से शादी नहीं करते ? तो क्या उनके बच्चे अभी छोटे नहीं होंगे ? या फिर तर्क का एक और पहलू दिमाग में आया कि क्या मैं किसी और के बच्चे के लिए नहीं खरीद सकता ? छोटे भाई का बच्चा ? किसी दोस्त का बच्चा ? सोचते-सोचते डायपर मेरे हाथ में था । मैंने उस पैकेट को देखते हुए दूर खड़ी उस लड़की की ओर देखा । बीच में खरीदारी करते हुए कुछ और लोग भी थे । मैंने थोड़ा सा एंगल बदल कर देखने की कोशिश की लेकिन वह नहीं दिखी । मैंने डायपर को नीचे रखा और परली तरफ़ के शेल्फ़ों के बीच से होकर आगे बढ़ा ।
स्टोर में सब कुछ था । सब कुछ मतलब सब कुछ । ब्रांड भले आपकी पसंद का ना मिले लेकिन वह चीज़ ज़रूर मिल जाएगी । मेरी कॉलोनी के पास भी दो स्टोर्स हैं लेकिन इतने बड़े नहीं । ऐसा नहीं है कि पहले किसी डिपार्टमेन्टल स्टोर में नहीं गया । कोलकाता, मुम्बई जैसे महानगरों की दुकानें भी देखी हैं । लेकिन ऐसा पहले कभी महसूस नहीं किया । जब से अंदर आया हूँ एक स्फ़ूर्ति सी महसूस कर रहा हूँ । एसी की ठंडक भी एकदम सही । लगता है फरवरी महीने की शुरुआत हो, सूरज बादलों के पीछे छिपा हो और मैं अपने गाँव के घर की छत पर घूम रहा हूँ । जैसे टहलते-टहलते उस छत की रेलिंग थाम कर खड़ा होऊँ ठीक वैसे ही मिल्क पाउडर के पैकेटों वाली शेल्फ़ को थाम रखा था मैंने और मेरा पूरा वज़न भी उस पर था । एक हाथ मेरे कंधे पर पड़ा - "सर आर यू ओके?" मैंने देखा सामने एक लड़का खड़ा था । मैंने सर हिलाते हुए उसे आश्वस्त किया तो उसने उस शेल्फ़ की ओर देखा । मैंने उसकी नज़रों का इशारा समझा और शेल्फ़ पर से अपने सत्तर किलो हटा लिए ।
लड़के ने शेल्फ़ को थोड़ा सा व्यवस्थित किया - "सर कोई लिस्ट हो तो मैं आपकी मदद कर सकता हूँ !"
मैं उसकी बात नहीं समझा ।
- अभी सारे डिस्प्ले डैंगलर नहीं लग पाए हैं । आप बताइए क्या चाहिए । ग्रोसरी या फिर किड्स आयटम्स ?
अब मैं समझा कि यह दुकान का स्टाफ़ है और ख़रीदारी में मेरी मदद करना चाह रहा है ।
- नहीं मैं खुद देख लूँगा ।
- आर यू श्योर ?
- यस !
- वो बैग्स उधर रखे हुए हैं । आप चाहें तो ट्रॉली भी ले सकते हैं । ला दूँ ?
- नहीं, नहीं चाहिए, उतना सामान नहीं होगा ।
- ओके सर !
वह घूम कर वापस चला गया । मुझे लगा एसी की ठंडक के लालच में ज़्यादा देर यहाँ रुका नहीं जा सकता । मैं अनजाने में ही एक तरफ़ चल दिया । थोड़ी देर और घूम लूँ फिर निकल जाऊँगा । निकलना तो है ही । सोचा कुछ खरीद ही क्यों ना लूँ ? लेकिन एक तो मैं बेकार की या बिना ज़रूरत की खरीदारी करता भी नहीं और दूसरे यहाँ से निकल कर मुझे अपनी पत्नी से भी मिलना था । उसके सवालों का जवाब कौन देगा ! क्यों लिया... यहाँ से क्यों लिया ... यहीं से क्यों लिया ... अभी क्या ज़रूरत थी !
कुछ लोग कहते हैं सब कुछ ईश्वर ने पहले से तय करके रखा हुआ है । कहाँ शहर के पूर्वी छोर पर मेरा दफ़्तर और यह दुकान पश्चिमी इलाके में ! सुबह ही बॉस ने कहा था यहाँ के एक क्लाइंट के साथ लंच पर मिल लूँ । अभी लंच पर ही था कि पत्नी का फ़ोन आ गया । क्लाइंट के सामने सच कहना ही पड़ा कि कहाँ हूँ और तुरंत पत्नी जी का आदेश आ गया कि लंच के बाद थोड़ी देर रुकना मैं आ रही हूँ । यह भी नहीं सुना कि मुझे वापिस ऑफ़िस जाकर बॉस के साथ भी बैठना है । थोड़ी देर बाद फ़ोन पर मैसेज आया कि उसे अपनी सहेली अनुपमा के घर जाना है । अनुपमा का घर इसी इलाके में है । अब अगर उसने कहा मुझे भी साथ चलने के लिए तो झगड़ा होगा ही होगा । अरे तुम्हारी सहेली है तुम जाओ, मैं अपना ऑफ़िस छोड़कर तुम्हारी सहेली के घर क्यों जाऊँ । लेकिन संयोग तो देखिए, आज ही इस इलाक़े में मेरी मीटिंग, आज ही उसका अपनी सहेली से मिलने का प्रोग्राम !
ईश्वर का पहले से तय किया हुआ एक और कारनामा हो गया । मैं दुकान से बाहर निकलने का बहाना खोज ही रहा था कि तभी मेरे फोन की घंटी बजी ।
- कहाँ हो तुम?
- तुम पहुँच गई?
- हाँ, तुम कहाँ हो ?
मैंने ’बस आया-बस आया’ कहा, फ़ोन को वापस जेब में रखा और बाहर की ओर लपका । जाते-जाते अनायास इधर-उधर नज़र चली गई । उस लड़की की तलाश में जो मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी । फिर इधर आना हो ना हो । एक आख़िरी बार तो उसे देख लूँ । यक़ीन मानिए अभी भी कोई चारित्रिक दुर्बलता नहीं थी । हालाँकि उस मोहिनी मुस्कान का और मेरे चरित्र के बीच का दूर वाला रिश्ता, जिसके बारे में मैंने बतलाने का वादा किया था, वह यह है कि ऐसी मुस्कानें, ऐसी चितवन एक पुरुष के चरित्र को दुर्बल करे ना करे, उसके आत्मविश्वास को ज़रूर बलवती करती हैं । और सिर्फ़ पुरुष ही क्यों, यह बात तो स्त्रियों पर भी लागू होती हैं । यदि लंपटता ना हो तो पुरुष की प्रशंसा भरी निगाहों से किस स्त्री को आपत्ति होगी । किसी को अपनी तरफ़ देखता देख कर, चेहरे पर बाल आए हों या नहीं, मगर औरतें उन्हें हटाती ज़रूर हैं ।
तो.. और ख़ास किसी कारण से नहीं... सिर्फ़ अपने आत्मविश्वास को ठीक-ठाक रखने के लिए मैंने चलते-चलते ही एक बार चारों ओर निगाह फेरी कि वह दिख जाए । वह कहीं नहीं थी । उसकी मुस्कान भी नहीं थी ।
मैंने फिर से सामने देखा और चलना शुरू किया । अचानक वह सामने दिखी - थोड़ी सी दूरी पर । उसने भी मेरी ओर देखा, ऊपर से नीचे तक । लेकिन इस बार उसकी आँखों में ना वो चमक थी, ना होंठों पर मुस्कुराहट । मेरा आत्मविश्वास और मैं .... दोनों लड़खड़ा गए । फ़र्श भी तो बहुत साफ़ और चिकना था । पैर पीछे की ओर फ़िसला, मैंने संतुलन बनाए रखने के लिए सामने वाली शेल्फ़ थाम ली । शेल्फ़ पर मसाले के पैकेट सजे हुए थे, कुछ उछलकर नीचे बिखर गए । छोटे-छोटे पैकेट थे, फटे नहीं । लुढ़कते - बचते भी यह विचार कौंधा कि कोई नुकसान नहीं हुआ । लेकिन तभी ज़ोर की आवाज़ हुई और शेल्फ़ पर रखे गत्ते के दो बक्से भी नीचे गिरे । सौभाग्य से ये भी खाली थे । लेकिन वह लड़का, जिसने खरीदारी करने में मदद की पेशकश की थी वह दौड़ा हुआ आया और मुझे सहारा देने से पहले दोनों बक्सों को देखा । मैं तो वैसे भी तब तक संभल कर अपने पैरों पर खड़ा हो चुका था । दोनों बक्सों को वहीं साईड में रखकर वह आगे बढ़ा और उस लड़की के पास खड़ा हो गया । मैं भी चेहेरे पर खिसियानी हँसी लिए आगे बढ़ा । अब तो सीधा बाहर ही जाना था । मैंने दोनों को ग़ौर से देखा । दोनों के कपड़े एक जैसे थे । नीचे नीली जीन्स और नीली स्कर्ट और ऊपर लाल कॉलर वाली कत्थई टीशर्ट । जब मैं दोनों के सामने से गुज़र रहा था तो लड़के ने लड़की से पूछा - क्या हुआ ?
लड़की के चेहरे से मुस्कान चार किलोमीटर दूर जा चुकी थी । मैं भी दोनों को पीछे छोड़कर मुख्य दरवाज़े की ओर बढ़ रहा था । पीछे से लड़की की आवाज़ सुनाई दी - कुछ नहीं ! लेना-वेना कुछ होता नहीं ! आ जाते हैं एसी की हवा खाने ।
मैं मुख्य दरवाज़े से निकलकर बाहर फुटपाथ पर आ गया था । खुले आसमान के नीचे, चारों तरफ़ क्रूर तपती हुई धूप । सामने सड़क पर पूरी रफ़्तार से गाड़ियाँ आ-जा रही थीं । सिग्नल बदला, मैं रास्ता पार कर लाल-बत्ती के पास आ गया । देखा पत्नी पास के स्टॉल के सामने खड़ी कोल्ड ड्रिंक पी रही थी ।
- तुम लोगे? उसने बोतल दिखाते हुए पूछा ।
मैंने अपनी ठुड्डी से सड़क के समानांतर दो बार हवा में अदृश्य लकीर खींची । उसका पीना लगभग ख़त्म हो चुका था । मैंने दुकानदार को पैसे दिए । पत्नी ने बोतल के नीचे बचे तरल को गोल-गोल घुमाते हुए कहा - "अनुपमा की बहन आई हुई है । याद है जो हमारी शादी में भी आई थी ? छ महीने का बेटा भी है अब तो । तो सोचा मिल आऊँ । अब वो अकेली होती तो ऐसे ही चली जाती । बच्चा है ना... तो उसे खाली हाथ गोद में लेना अच्छा नहीं लगेगा । उसके लिए गिफ़्ट लेना है कुछ । चलो । मुझे तो समझ में ही नहीं आ रहा क्या लूँ ।"
दुकान से आगे बढ़कर हम फिर लालबत्ती के सामने आ गए ।
मैंने पूछा - कहाँ से लेना है ?
- अरे क्या लेना है... यही नहीं समझ में आ रहा तो कहाँ से लेना है कैसे बताऊँ ।
अचानक उसकी नज़र भी सामने वाले डिपार्टमेंटल स्टोर पर पड़ी ।
- अरे वो देखो... अनुपमा ने बताया था कि यहाँ भी यह खुल गया है । मैं तो भूल ही गई थी । यहाँ कुछ ना कुछ ज़रूर मिल जाएगा । आओ ।
लेकिन सामने रास्ते पर गाड़ियाँ जा रही थी । वह रूक गई । मुझे अजीब सा लग रहा था । फिर से वहाँ ? लेकिन फिर ख्याल आया कि इस बार तो खरीदना है । मैंने पत्नी का हाथ पकड़ कर कहा ।
- एक काम करो । शादी के बाद पहली बार मिलोगी ना उससे ? उसके लिए भी कुछ ले लेना । साड़ी-वाड़ी !
पत्नी ने सुखद आश्चर्य से मुझे देखा ।
- कमाल है ! कभी मेरे लिए तो ऐसे नहीं आता दिमाग में ।
- तुम भी ले लेना एक ।
- बजट ?
मेरे दिमाग में अंदर ही अंदर एक प्रतिशोध पैदा हो रहा था । उस प्रतिशोध को पूरा करने का हथियार था मेरे पास ।
- नो बजट !
मेरे पर्स में क्रेडिट और डेबिट दोनों ही कार्ड थे । अंदर कहीं एक अंहकार भी पंख फैला रहा था । संभव होता तो अपने दफ़्तर और घर दोनों जगह ले जाकर उसे एसी दिखा देता । अब एक दूसरे तरह का आत्मविश्वास अहंकार की शक्ल ले रहा था । मेरे अनजाने ही मेरा मन अब उस मुस्कान का कायल नहीं था बल्कि उस चेहरे पर शर्मिंदगी वाला भाव देखना चाह रहा था । या नहीं भी दिखाई देता वह भाव तो भी कैसे भी करके बिल की राशि तो कम से कम बता ही देता ।
सामने लोग रास्ता पार कर रहे थे । पत्नी ने हाथ पकड़ कर खींचा - चलो !
कुछ ही देर में मैं फिर से उसी स्टोर के अंदर था ।
सामने खड़ी थी वही मुस्कान धारण किए हुए लड़की । पता नहीं मुझे देख रही थी या मेरी पत्नी को या दोनों को । मैंने उसकी आँखों में पढ़ना चाहा कि थोड़ी देर पहले उसने जो कहा था वह उसे याद भी है या नहीं ! मुझे उस मोहिनी मुस्कान के अलावा कुछ भी नहीं दिखा ।
मेरी पत्नी ने आगे बढ़कर उससे साड़ी काउंटर के बारे में पूछा । वह रास्ते दिखाते हुए आगे बढ़ी और एक मोड़ मुड़कर एक ओर इशारा कर दिया । सामने लंबा-चौड़ा काउंटर था और उसके सामने हैंगर से लटकी हुईं साड़ियाँ । उसके भी सामने एक और लड़की --- मुस्कुराती हुई । बड़ी जानी-पहचानी मुस्कान । हम आगे बढ़े... काउंटर के पीछे से एक और चेहरा बाहर निकला --- मुस्कुराता हुआ ।
आधे घंटे बाद पाँच हज़ार सात सौ के पैकेट हाथों में थामे हम बाहर की ओर आ रहे थे । मुख्य दरवाज़े पर सख़्त चेहरे वाला एक वर्दीधारी सिक्योरिटी गार्ड खड़ा था । पहली बार इस दुकान से निकलते समय इसे नहीं देखा था । हमारे हाथ में थमे पैकेटो का जादू था ये शायद । वर्दीधारी गार्ड ने हाथ आगे बढ़ाया । मैंने ग़ौर से उसका गंभीर चेहरा देखा । उसके चेहरे पर रत्ती भर भी मुस्कान नहीं थी ।
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---- राकेश कुमार त्रिपाठी
My Voice Samples
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जंगल
मुझे जंगल पसंद है
वही जंगल
जहाँ खूँखार शेर बसते हैं
जहाँ घिनौने गीदड़ रहते हैं
जहाँ हर तीखे दाँत
नर्म माँस को चीरने-फाड़ने के लिए बेताब हैं
मुझे जंगल पसंद है
जहाँ मृत शरीरों पर भी
अपना महाभोज करने उतर आते हैं
गिद्ध - अपने पूरे कुनबे के साथ
मुझे जंगल पसंद है
जहाँ छोटे से छोटे कीड़े भी
चट कर जाते हैं हड्डियों के अवशेष
डर लगता है
मगर फिर भी
अच्छा लगता है ये जंगल
क्योंकि आज भी अनवरत
उसके बीच एक दूब उग रही है कहीं
और एक सूखे तिनके को
नन्हीं सी चोंच में दबाए
चिड़िया उड़ी जा रही है अपने घोंसले की ओर
वही जंगल
जहाँ खूँखार शेर बसते हैं
जहाँ घिनौने गीदड़ रहते हैं
जहाँ हर तीखे दाँत
नर्म माँस को चीरने-फाड़ने के लिए बेताब हैं
मुझे जंगल पसंद है
जहाँ मृत शरीरों पर भी
अपना महाभोज करने उतर आते हैं
गिद्ध - अपने पूरे कुनबे के साथ
मुझे जंगल पसंद है
जहाँ छोटे से छोटे कीड़े भी
चट कर जाते हैं हड्डियों के अवशेष
डर लगता है
मगर फिर भी
अच्छा लगता है ये जंगल
क्योंकि आज भी अनवरत
उसके बीच एक दूब उग रही है कहीं
और एक सूखे तिनके को
नन्हीं सी चोंच में दबाए
चिड़िया उड़ी जा रही है अपने घोंसले की ओर
चौदह अगस्त
आज के दिन
यानी चौदह अगस्त के दिन
सालों पहले हम ग़ुलाम थे
ख़ुशी की बात है न ?
आज नहीं है !
सालों पहले चौदह अगस्त के दिन
हम बँटे हुए थे
जातियाँ थी, धर्म थे
ज़ुबानें थीं, दंगों के बाज़ार गर्म थे
कम थी उनकी तादाद
जिन्हें कह सकते थे - भारतीय
हम शिकार थे शोषण का
भूखी - नंगी
जनता पे वार था कुपोषण का
हमारे पैसों पर किसी और का राज था
सिर्फ़ दिल्ली के सर पे ताज था
अनपढ़ बच्चे भूख से बिलबिलाते
बड़े होकर बेरोजगार बन जाते
कुछ उस व्यवस्था से लड़ने के लिए
हाथों में उठाते थे देसी तमंचे, बम
खुशी की बात है
आज आज़ाद हैं हम !
उस चौदह अगस्त में कालिमा थी
आज देखो कितना उजाला है !
खुशियाँ ज़रूर मनाना
कल फिर पंद्रह अगस्त आने वाला है !
यानी चौदह अगस्त के दिन
सालों पहले हम ग़ुलाम थे
ख़ुशी की बात है न ?
आज नहीं है !
सालों पहले चौदह अगस्त के दिन
हम बँटे हुए थे
जातियाँ थी, धर्म थे
ज़ुबानें थीं, दंगों के बाज़ार गर्म थे
कम थी उनकी तादाद
जिन्हें कह सकते थे - भारतीय
हम शिकार थे शोषण का
भूखी - नंगी
जनता पे वार था कुपोषण का
हमारे पैसों पर किसी और का राज था
सिर्फ़ दिल्ली के सर पे ताज था
अनपढ़ बच्चे भूख से बिलबिलाते
बड़े होकर बेरोजगार बन जाते
कुछ उस व्यवस्था से लड़ने के लिए
हाथों में उठाते थे देसी तमंचे, बम
खुशी की बात है
आज आज़ाद हैं हम !
उस चौदह अगस्त में कालिमा थी
आज देखो कितना उजाला है !
खुशियाँ ज़रूर मनाना
कल फिर पंद्रह अगस्त आने वाला है !
जन नायक
हे जन नायक !
सच बताना
यदि तुम्हीं हो गण नायक,
तो वो कौन है
जो खंभों वाली विशाल इमारत से
बाहर आ आकर
दहाड़ता है
चिंघाड़ता है
खिसियाता है
रिरियाता है
फुँफकारता है
पुचकारता है
कि वही है असली भाग्य विधाता ?
सच बताना
हे गणपति !
तुमने तो हर-गौरी का चक्कर लगाया था
कि वही है ब्रंह्मांड का व्यास
लेकिन आज एक वृद्धाश्रम के सामने
सजे-धजे पंडाल में तुम्हारा वास
सुहाता है तुम्हें ?
तुम्हें तो सुहाता है
हे लंबोदर
मोदक का भोग !
सच बताना
उस खोवे में मिलावट तो नहीं
वैसे मिलावट का रोग
कहाँ नहीं है
मेरी भक्ति में भी
है काव्य की मिलावट
या काव्य में भक्ति की !
नहीं जानता
यदि तुम्हें पता हो तो बताना
हे बुद्धिनाथ
विसंगति से भरे विश्व में
तुम्हारे उत्सव का आनंद हो ?
या तुम्हारे उत्सव के आनंद से
हर विसंगति का नाश हो !!!
हे गजानन !
सच बताना
तुम तो सर्वव्यापी हो !
फेसबुक पर भी हो क्या ?
नहीं हो तो लिखना क्या !
मिटाना क्या !
और अगर हो
तो कमेंट तो करो
गणपति बप्पा मोरया !!
सच बताना
यदि तुम्हीं हो गण नायक,
तो वो कौन है
जो खंभों वाली विशाल इमारत से
बाहर आ आकर
दहाड़ता है
चिंघाड़ता है
खिसियाता है
रिरियाता है
फुँफकारता है
पुचकारता है
कि वही है असली भाग्य विधाता ?
सच बताना
हे गणपति !
तुमने तो हर-गौरी का चक्कर लगाया था
कि वही है ब्रंह्मांड का व्यास
लेकिन आज एक वृद्धाश्रम के सामने
सजे-धजे पंडाल में तुम्हारा वास
सुहाता है तुम्हें ?
तुम्हें तो सुहाता है
हे लंबोदर
मोदक का भोग !
सच बताना
उस खोवे में मिलावट तो नहीं
वैसे मिलावट का रोग
कहाँ नहीं है
मेरी भक्ति में भी
है काव्य की मिलावट
या काव्य में भक्ति की !
नहीं जानता
यदि तुम्हें पता हो तो बताना
हे बुद्धिनाथ
विसंगति से भरे विश्व में
तुम्हारे उत्सव का आनंद हो ?
या तुम्हारे उत्सव के आनंद से
हर विसंगति का नाश हो !!!
हे गजानन !
सच बताना
तुम तो सर्वव्यापी हो !
फेसबुक पर भी हो क्या ?
नहीं हो तो लिखना क्या !
मिटाना क्या !
और अगर हो
तो कमेंट तो करो
गणपति बप्पा मोरया !!
मार कटारी
मार
कटारी, मार कटारी
धार
कटारी, चार कटारी, वार कटारी
मार
कटारी
धूर्त
मुखौटे खद्दरधारी, डंडाधारी, झंडाधारी
इनकी
बारी, उनकी बारी, सबकी बारी, बारी-बारी,
पीट
कटारी, पाट कटारी,
मार
कटारी
दिल्ली
वाली, बिल्ली वाली, नियम कटारी,
आईन कटारी
वर्दी
को सब चुका रहे, घूस कटारी, फाईन कटारी
उफ़्फ़
कटारी, आह कटारी
मार
कटारी
अवध
बिहारी? कृष्ण मुरारी? - भज के लूटे लछमी
सारी
डरा
के रखे दुनिया सारी, ढोंगी-पोंगी तिल्लकधारी
!
पुण्य
कटारी, पाप कटारी,
मार
कटारी
मोल
कटारी, भाव कटारी, सगों में पेंच-दाव कटारी
रिश्ता
फुंसी, कुनबा फोड़ा, प्यार-प्रीत में घाव कटारी
दोस्त
कटारी, यार कटारी
मार
कटारी
बाद
में लेना जान कटारी, पहले तो पहचान कटारी
सीख
कटारी. समझ कटारी, बड़ी अनोखी, ज्ञान कटारी
गुरू
कटारी, शिष्य कटारी
मार
कटारी
सहना
छोड़ो, कहना सीखो, ज़ोर से चीखो,
नर ओ नारी
लालम
लाल कर दो भैय्ये, अंबर सारा, धरती सारी
नीर
कटारी, पीर कटारी
मार
कटारी
धुन
कटारी, गीत कटारी, होले जन, गण, मन कटारी
बीज
कटारी, खेत कटारी, स्वप्न कटारी,
नयन कटारी
उगे
कटारी, फले कटारी
मार
कटारी
नाव
नाव.....
लेकर तुम्हारा सहारा
इस पार से उस पार हुआ मैं
भूल गया पीछे
लहरों पे सवार
तुम अब भी वहीं हो
अपने उस पार लौटने के इंतज़ार में
क्या यात्रा खत्म कर
जब लौटूँगा
नाव मिलेगी यहीं
मुझे फिर से उस पार ले जाने के लिए ?
"Kaimre Ki Nigrani" (you are under surveillance) - a story by Rakesh Kumar Tripathi
कैमरे की निगरानी
बहुत दिनों बाद अपने दोस्त के शोरूम में जाना हुआ । शोरूम में दो तीन जगह सुंदर और बड़े अक्षरों में लिखा था - "यू आर अंडर सीसीटीवी सर्विलियेंस" यानी कि आप कैमरे की निगरानी में हैं । पहले ये बोर्ड नहीं थे । मेरी नज़र पूरे शोरूम में घूम गई, आदतन ! जो कैमरे हमें देख रहे हैं, उन्हें मैं भी तो देख लूँ एक बार । इसे और कुछ नहीं तो सहज जिज्ञासा ही कह लीजिए, या कारण ये भी हो सकता है कि हम ही वो पीढ़ी हैं जिसकी आँखों के सामने तकनीक ने इतनी तेज़ी से गति बदली है । हमारे बचपन में कहाँ थे ये सीसीटीवी कैमरे ! हर तरह के शोरूम से कितनी चीज़ें ग़ायब हो जाती थीं ! कपड़ों का ये शोरूम मेरे एक करीबी दोस्त का है - इसीलिए मुझे पता है । हालाँकि कोई ज़्यादा आर्थिक नुकसान तो उन लोगों को नहीं होता था लेकिन चोरी हो जाने की खुन्नस ज़रूर होती थी । उससे भी ज़्यादा कोफ़्त होती थी कि इतने लोगों की आँखों के सामने से कोई कैसे, शर्ट-साड़ी या कुछ और, उठा ले गया ! ख़ैर, बात सीसीटीवी की हो रही थी, जो कि कुछ साल पहले तक सार्वजनिक जीवन का आवश्यक हिस्सा नहीं हुआ करता था । वही कैमरे अब मेरे दोस्त के शोरूम में भी लगे हुए थे और लोगों की निगरानी कर रहे थे । निगरानी ! लोगों की या सामान की ? बहरहाल, कैमरे तो लगे हैं और वो लगातार मेरी फोटो भी खींच रहे हैं और हो सकता है कि कंट्रोल रूम में बैठा कोई मुझे स्क्रीन पर लाईव देख भी रहा है । फोटो खिंचवाने और लाईव देखे जाने की ललक आजकल किसे नहीं है ! हो सकता है कि मेरा दोस्त ही बैठा हो कंट्रोल रूम में ! इसीलिए सोचा कैमरा दिख जाए तो उसमें देख कर हाथ ही हिला दूँ । तभी कंधे पर हाथ पड़ा तो देखा पीछे मेरा वही दोस्त खड़ा है । मैंने अचरज से पूछा – "यार, कैमरे कहाँ लगा रखे हैं ? पूरे शोरूम में कहीं दिख ही नहीं रहे ?"
दोस्त ने बात घुमा दी और किसी से चाय लाने को कहा । मुझे लेकर शोरूम के पीछे अपने छोटे से चेंबर में चला आया । वहाँ पहुँच कर मुझे अहसास हुआ कि हमारी पिछली मुलाक़ात के बाद से या कहें कि इस शोरूम में मेरे पिछली बार आने के बाद से यहाँ काफ़ी कुछ बदला है - अच्छा ही बदलाव है - तरक्की झलक रही है । मैंने कहा – "कमाई तो अच्छी हो रही है?"
दोस्त मेरा मतलब समझ गया, बोला –"ये मॉल वालों ने कॉन्सेप्ट ही चेंज कर दिया है । मेरे दादा जी गद्दे पर बैठ कर दुकानदारी करते थे और हमसे अच्छा कमाते थे । कमाई कम हो फिर भी ये सब ताम-झाम करना पड़ता है । वरना जो थोड़े बहुत कस्टमर आते हैं वे भी न आएँ ! स्सालों के घर में टूटी खिड़की हो पर ग्रॉसरी शॉप भी एसी चाहिए ।"
बोल कर थोड़ा सहम गया । उसे पता था मेरे घर में एसी नहीं है । मैं बात को घुमा कर फिर कैमरे पर आ गया – "कंट्रोल रूम कहाँ है?"
उसने हैरानी से पूछा – "कंट्रोल रूम ?"
मैंने मज़ाक में कहा - "जहाँ बैठ कर शोरूम में आई सुंदर कस्टमरिनियों को घूरता है तू !"
कस्टमर का ऐसा लिंग भेद सुनकर वह थोड़ा मुस्कुराया मगर उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वो अब भी मेरा अभिप्राय नहीं समझा । मैंने किसी सिनेमा डाईरेक्टर की तरह दोनों हाथों से कैमरे का फ़्रेम बनाया और बोला "सीसीटीवी!"
दोस्त समझ गया और उसके फूले हुए शरीर से हैरानी की हवा जैसे ही निकली, वह कुर्सी पर पीछे घिसक कर आराम से बैठ गया । थोड़ी देर मेरी आँखों में घूरते रहने के बाद बोला - "साल में दो-तीन चोरियाँ होती थीं, अब भी होती है । कौन इन छोटी चोरियों की रिपोर्ट करता है ! पुलिस आएगी तो हज़ार का नाश्ता कर के जाएगी । सामान तो मिलने से रहा ! पुलिस भी क्या खोजेगी ? कोई चार सौ की शर्ट ले गया है, कोई पाँच सौ - हज़ार की साड़ी ले गई है । साल भर में कभी कोई बच्चों के कच्छे चुरा कर ले गया तो .... " अचानक उसे याद आया - "दादा जी के टाईम में तो एक आदमी लुंगी चुराते पकड़ा गया था !"
मैंने आश्चर्य से पूछा - "लुंगी! तुम्हारे शोरूम में!"
उसने कहा -"दादाजी के टाईम तो रखते ही थे, पापा ने बंद कर दिया था लेकिन अब हनी सिंह और शाहरूख के चक्कर में हम भी रखते हैं ।"
"ख़रीद्दार?" - मैंने पूछा ।
वो मुस्कुराते हुए बोला -"बाज़ार में सामान होगा..... तो खरीद्दार भी होंगे!"
उसकी दार्शनिकता से मैं प्रभावित हुए बग़ैर नहीं रह पाया । दोस्त ने अपनी बात आगे बढ़ाई - "अब इन सब मामूली चोरियों के लिए लाख - दो लाख खर्च कौन करे? नौ की लकड़ी, नब्बे खर्चा !"
मैंने हैरानी से पूछा - "तो कैमरे क्यों लगवाए?"
उसका शांत सा उत्तर आया - "कहाँ लगवाए? सिर्फ़ बोर्ड लगा दिया है कि यू आर अंडर सर्विलियेंस । लोगों को आदत पड़ चुकी है ये बोर्ड देखने की । जो चोर हैं वे सावधान हो जाते हैं, बाकियों के मन में कैमरे के डर से चोरी का ख़याल भी नहीं आता । जब पाँच सौ रूपए के पाँच बोर्ड से काम चल जाता है तो पाँच कैमरा कोई क्यों खरीदे!"
मेरा ये दोस्त इतना स्मार्ट है मुझे मालूम न था ! उसकी स्मार्टनेस देखकर या सच्चाई जानकर, पता नहीं क्यों, मगर मेरे मुँह से आवाज़ ही नहीं निकली । आगे भी वही बोला - "और एक कमाल की बात पता है ? जब से ये बोर्ड लगवाए हैं, एक भी चोरी नहीं हुई!"
हमारी बात और आगे बढ़ती लेकिन तभी उसके दादाजी के आने की ख़बर मिली । वैसे तो दुकान पे नहीं आते थे लेकिन महीने में एक आध बार देखने आ जाते थे कि उनके गद्दे से लेकर मार्बल फ़्लोरिंग तक के सफ़र में और क्या क्या बदला है । उनके आते ही सब उन्हीं के पीछे लग गए । दो स्टाफ़ उन्हें सहारा देकर चेंबर में ले आए । ऊँची पीठ वाली कुर्सी मेरे दोस्त ने खाली कर दी । मैंने भी आगे बढ़कर पैर छुए । उन्होंने आँखे सिकोड़कर मुझे पहचाना, काँपते हाथों से आशीर्वाद दिया और बोले - "तुमको उस दिन ....दुर्गा मंदिर के पास देखा था..... मैं ...गाड़ी में जा रहा था ।"
मैं सिर्फ़ मुस्कुरा दिया । वे आगे बोले -"सोचा.... गाड़ी रुकवाकर ...तुम्हें बुलवाऊँ....." ।
मैंने सवालिया भंगिमा के साथ गर्दन को आगे की ओर बढ़ाया ।
"फिर देखा तुम ..... सिग्रेट पी रहे हो... सोचा... शर्मिंदा हो जाओगे ।" उनकी आँखों में बुड्ढों वाली वो ख़ास शरारत थी जिसके सहारे वे जवानों की अक्सर खिंचाई करते हैं । मैं क्या बोलता ! बस बालों में एक ख़ास अदा के साथ हाथ फेर कर रह गया । लेकिन वे अभी और शर्मिंदा करने पर तुले हुए थे –
"बीच बाज़ार में सिग्रेट... कितने लोग आते जाते हैं... मान लो तुम्हारे पापा ने देखा होता तो..कितना दुखी होते !" आक्रमण सीधा और प्रत्यक्ष था । दुकान के जो स्टाफ़ दादाजी को ढो कर यहाँ लाए थे, वे अब भी यहीं खड़े थे और मेरी तरफ़ ही देख रहे थे । मुझे लगा मुस्कुराहट दबाने की कोशिश कर रहे थे । मैं बेशर्म हो गया । पहले सोचा था मुकर जाऊँगा । लेकिन अब मेरे मुँह से निकला -"मैं तो रघुनंदन टी स्टॉल के पीछे खड़ा था... आपने कैसे देख लिया ?"
वे हँस कर इज़राईल हो गए... मुझे गाज़ा बना कर एक और रॉकेट दागा -"छिप कर पी रहे थे?"
मैं भी पल भर के लिए हमास हो गया -"हाँ... ताकि कोई देख न ले !"
उनके मुँह से मानों इस बार अमरीका बोला -"कोई देखे न देखे...." उन्होंने अपनी ऊँगली ऊपर की ओर दिखाई, "....वो ज़रूर देखता है... उससे बचकर कहाँ जाओगे?"
मुझे लगा वो ऊपर यूनाइटेड नेशन्स की ओर इशारा कर रहे थे । मेरी नज़र में आज तक ऐसा नहीं हुआ था कि मुझे महसूस हो कि ऊपर से सचमुच कोई देखता है । देखता है .. तो देखे ! यूएन को क्या दिख नहीं रहा कि इज़राइल क्या कर रहा है । मैंने अपने आप को रोका... हर बात को दुनिया भर में होने वाली घटनाओं से जोड़ कर देखने लगता हूँ । कम्पटीटिव एग्ज़ाम्स की तैयारी का नतीज़ा है ये शायद । सिग्रेट की लत भी वहीं से लगी है । राजकुमार हिरानी जैसे मँझे हुए हुए फ़िल्ममेकर ने एक गुंडे के किरदार को अगर सिग्रेट नहीं पिलाई तो सिर्फ़ इसलिए क्योंकि रातों को जागने से उसके दिमाग में केमिकल लोचा करवाना था ! रातों को जाग - जाग कर पढ़ने से मुन्ना भाई वाला केमिकल लोचा न हो जाए, इसलिए दिमाग को जगाए रखना पड़ता है । जगा हुआ दिमाग ये भी कहता था कि धुँआ उड़ाने का जस्टीफ़िकेशन नहीं हो सकता । धत !....मैं आया था अपने दोस्त से कुछ पैसे उधार माँगने... लेकिन उसके बाद दादा जी ने दार्शनिकता और भगवद भक्ति का ऐस लेक्चर पिलाया कि मैं चाय आधी छोड़ कर बाहर निकल आया । मेरे सारे दोस्तों की तरह ये दोस्त भी समझदार था । दरवाज़े पर आकर पूछा -"पैसा-वैसा है न?"
देश का हर सत्ताधारी नेता पूरे आत्मविश्वास से कहता है कि अगले तीन-चार दशकों में भारत विश्व की सबसे शक्तिशाली अर्थ व्यवस्था वाला देश होगा । मैं भी उसी आत्मविशास के साथ बोला -"अगले महीने पापा को बोनस मिलने वाला है.. दे दूँगा ।"
दोस्त ने दाँत भींच कर अपनी पूरी ताक़त से मेरी पीठ पर झापड़ मारा और बोला -"तू बाहर रूक.. एक मिनट!" चेंबर से बाहर आकर लगा.. अब जल्दी से शोरूम के बाहर भी निकलूँ और एक सिग्रेट जलाऊँ । दोस्त उम्मीद से पहले लौटा । मेरी जेब में नोटों का छोटा सा बंडल ठूँस दिया । मैंने सचमुच कृतज्ञ होकर कहा -"इतना क्यों?" उसने मुझे बाहर की ओर धक्का दिया और बोला - "अब जा... शाम को तेरे मुहल्ले में आता हूँ । बहुत दिन हो गए... रघुनंदन के वहाँ की चाय नहीं पी!"
मैं बोला..."बाहर चल ना... एक एक सिग्रेट पीते हैं फिर चले आना !"
उसने बाहर दरवाज़े की ओर देखा और कहा -"अभी डैडी भी आते होंगे... देख लिया तो आज मेरा भी क्लास हो जाएगा...तेरी तरह ।"
मैंने पूछा नहीं पर उसने खुद ही मानों मेरा सवाल समझ लिया और जवाब भी दे दिया -"एक साथ तीनों जेनेरेशन...दादा जी ने ख़ास बुलाया है... चाचा जी भी आने वाले हैं ।"
मैं जानता था दोस्त के चाचा जी के हिस्से भी पुलिस चौकी के पास वाला बड़ा शोरूम आया था । दोस्त आगे बोला -"दादा जी बहुत गुस्सा हैं कि हर साल इतना टैक्स क्यों भरते हैं ये लोग? अकाउंटेंट को भी बुलवाया है । दो घंटे की क्लास होगी कि इन्कम टैक्स वगैरा कैसे बचाया जाए !"
मैं हिस्ट्री और पॉलीटिकल साइंस का स्टूडेंट, अकाऊंट कभी समझ में नहीं आया, फिर भी बोला -"टैक्स तो जितना बनेगा, उतना ही ना देना पड़ेगा ?"
वो खी-खी कर हँसा..."तू नहीं समझेगा.. सब होता है...सब अकाउंट्स का खेल है ! पूरा का पूरा टैक्स भर दें तो फिर से वही ...गद्दी पर बैठ कर लुंगी बेचना पड़ेगा । चल शाम को मिलता हूँ ।"
वो अंदर चला गया । मैं दो पल वहीं खड़ा रहा । दोस्त की हँसी सुनकर दो एक सेल्समैन इधर ही देख रहे थे । मैंने देखा तो मुस्कुरा दिए । सेल्समैन के सर पर के ऊपर लगे बोर्ड पर फिर नज़र पड़ी मेरी । "आप कैमरे की निगरानी में हैं ।"
मैं बाहर चला आया । जेब में पैसे थे...मुझे खुश होना चाहिए था...लेकिन थोड़ी देर बाद मेरी ऊँगलियों के बीच सिग्रेट फँसी हुई थी और दिमाग में कुछ विचार ट्रेन की स्पीड से भी ज़्यादा स्पीड से दौड़े जा रहे थे । निकोटीन ने स्नायु तंत्र को सक्रिय कर दिया था । कहीं कोई कैमरा नहीं है । सिर्फ़ बोर्ड लगे हैं । "आप कैमरे की निगरानी में हैं ।" और चोर सचेत हो जाते हैं ! पकड़े जाने का डर...सज़ा का भय ! कैमरा नहीं है....कहीं कोई लाईव नहीं देख रहा... कहीं कोई रिकॉर्डिंग नहीं हो रही...बस कैमरे का डर ! बस कैमरे का डर ?
सामने दुर्गा मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं । "अरे मैं इतनी जल्दी मंदिर तक चला आया ?" मंदिर के सामने लाईन लगी थी । मैं प्रणाम करने के इरादे से रुक गया । जहाँ जूते उतारने थे...वहाँ भी दीवार पर बोर्ड लगा था -"जूते-चप्पल रखकर टोकन अवश्य लें । अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें ।"
मैंने जू्ते खोले और उसकी फटी हुई सोल को छिपाते हुए काउंटर वाले को दिए... टोकन लेकर मुख्य दरवाज़े पर आया... वहाँ भी बोर्ड लगा था -"ये मंदिर कैमरे की निगरानी में हैं ।" मैं दो पल ठहरा.... उल्टे पाँव लौटा और जूता - काऊंटर पर लौटकर टोकन दिखलाया । बूढ़े काउंटर वाले ने अचरज से पूछा -"हो गया? इतनी जल्दी?" मैंने जूते पैर में घुसेड़े और बोला -"हो गया !" मंदिर से दाहिने हाथ पर ही रघुनंदन की चाय-सिग्रेट की दुकान थी ! मैं बाँयी तरफ़ मुड़ गया !
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