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जंग से पहले

मैं जानता हूँ
मैं गाँधी नहीं, सुभाष नहीं,
टैगोर भी नहीं,
न ही मैं हूँ आज़ाद,
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु 
या पिछले हफ्ते पुलिस के साथ हुई
नकली मुठभेड़ में 
मारा गया वो
गुमनाम शख़्स भी नहीं,
जिसे लोग मजदूर यूनियन का नेता या
नक्सलवादी या पता नहीं क्या क्या बताते हैं !
नहीं तो न सही |
मैं 'मैं' तो हूँ,
जो जानता है कि 
इन सारे लोगों ने 
लड़ी थी एक लड़ाई,
अपनी बुद्धि, अपनी समझ से,
अपने - अपने ज़माने को
पहचान कर, समझ कर |
तुम मुझे भी मार देना गोली,
टाँग देना सलीब पर,
लटका देना फाँसी के फंदे से,
या एक आख़िरी मौत भी देना
भुलाकर अपनी स्मृतियों से |
पर मैं लड़ूँगा,
लड़ने की कोशिश करूँगा,
बस इंतज़ार करो और 
थोड़ी देर और
चैन की साँस ले लो |
जब तक मैं ज़रा समझ लूँ
अपनी इस दुनिया को,
इसके रंग - ढंग को,
इसकी रग - रग को |


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मई, 1996
राकेश कुमार त्रिपाठी
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