click to have a glimpse of my journey so far

हार - जीत - हार


उन्होंने सोचा था
कुछ न देखेंगे, इसलिए
आँखें बंद किये हथेलियों से,
पड़े रहे चुपचाप |
मगर, आती रहीं,
लाल करती रहीं,
उनके दृष्टि पटल को 
ख़ून की बूँदें !!

उन्होंने सोचा था
कुछ न सुनेंगे, इसलिए
कानों को बंद किये, उंगलियाँ घुसेड़े,
बहरे बने रहे |
मगर, हलाक़ होती बकरियों की आवाज़
सुनाई पड़ती रही !!

उन्होंने सोचा था
कुछ न बोलेंगे, इसलिए
होंठों को सी कर पड़े रहे
और यक़ीन मानिए,
किसी के मुँह से
उफ् तक नहीं निकली !!!
      **********

सच है !
आदमी अगर सोच ले
तो सफलता कभी न कभी
मिलती ही है
और
मानव ख़ुद को
विजयी समझता है !!
***********************

                           अगस्त,1992
                          राकेश कुमार त्रिपाठी




to go to the list of poems click here


No comments: