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नेता उवाच

हमारे नेता जी का तो यही कहना है -- 
" कि देश को अगर बचाकर रखना है,
तो पहले गाँधी जी को जानना होगा,
उनके सिद्धांतों को मानना होगा,
मैंने तो हमेशा उनपर अमल किया है,
मैंने भी अहिंसा पर ही बल दिया है, 
गाँधी जी कहना था 'पहले करो आत्मशुद्धि',
सो मैंने भी अपनाई है वही बुद्धि,
अहिंसा - व्रत पहले मैंने ख़ुद पर आजमाया
तब से लेकर आज तक उसका सुफल ही पाया,
अब कौन है, जो मेरे ख़िलाफ़ हिंसा का रास्ता अपनाए,
उससे पहले ही 'अपने सोचे हुए' की सज़ा ना पा जाए,
ना, ना, ग़लत न समझो, सज़ा मैं नहीं देता,
हिंसा का पाप अपने सर नहीं लेता,
शुभचिंतक मेरे आगे पीछे पहरा देते हैं,
जाने - अनजाने चौरी-चौरा कांड दुहरा देते हैं,
गाँधी जी के सामने मैं क्या हूँ,
नेता तो अभी बिल्कुल नया - नया हूँ, 
वो सारे देश की एकता के थे पक्षपाती,
पर मेरी तो सारे देश पर चल नहीं पाती,
बस कुछ नौजवान हैं जो मेरा साथ देते हैं,
बेचारे, अकेले ही सारे क्षेत्र का वोट छाप देते हैं,
मेरा तो यही मत है कि जनता आराम करे,
मेरे लोग ही ये झमेले वाला काम करें,
चुनाव जीतकर भी गाँधी जी के सिद्धांत नहीं तोड़ता,
उनके तीन बंदरों का साथ तो कभी नहीं छोड़ता,
वो अपने आँख, कान, मुँह बंद किये रहते हैं,
हम भी मन में यही दृढ़ संकल्प लिए रहते हैं,
उनके विचारों को और व्यापक बनायेंगे,
उनके विचार घर - घर में फैलायेंगे,
तो आज से हम ये वादा करते हैं,
हिसाब बिल्कुल सीधा - सादा करते हैं, 
दो बंदर तो हम रख लेते हैं, 
और आख़िरी आपको दिए देते हैं,
तो हमारी आँखें और कान आज से बंद होंगी,
आशा है, ये सलाह आपको भी पसंद होगी,
अब बचा काम आख़िरी बंदर वाला,
तो अपने मुँह पर आप लगा लीजिये ताला,
पाँच साल बाद आकर ये ताला हम ही खोलेंगे,
तब तक कृपया आप कुछ नहीं बोलेंगे | "

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अप्रैल, 1994
राकेश कुमार त्रिपाठी




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