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अनंत

और बच्चों की तरह
मैं भी पैदा हुआ था
मुट्ठियाँ भींचे,
चौबीस में बीस घंटे
अपनी आँखें मींचे |
धीरे - धीरे मेरी आँखें
खुलती चली गयीं |
स्वच्छ रोशनी से
स्याह रातें धुलती चलती गयीं |
फिर वो दिन आया,
जब मैंने नन्हें हाथों को भारी पाया |
मैंने भारी लगते अपने हाथों को तोला,
धीरे - धीरे अपनी हथेलियों को खोला |
हज़ारों - लाखों सपने ....
रंग - बिरंगी तितलियों की तरह 
मेरे चारों ओर बिखरने लगे |
कभी इधर - उधर फैला किये,
कभी पास आ सिमटने लगे |
कुछ उड़ती तितलियों को
मैंने भाग - भाग कर पकड़ा,
"फिर कभी न उड़ने दूँगा"
ये सोच उन्हें ज़ोर से जकड़ा |
वो बाहर आने को छटपटाती रहीं,
कुछ और तितलियाँ मेरे पास आ
अपने पंख फड़फड़ाती रहीं,
अपने मोहक पंख फैला 
मन को लुभाती रहीं |

मुझे पता था,
उन्हें पकड़ने को जो हाथ बढ़ाऊँगा,
तो जो मुट्ठियों में क़ैद हैं,
उनको भी गवाऊँगा |
पर, इन आँखों के सामने 
उड़ती तितलियों का क्या करता ?
क्या आँखें बंद करके
फिर से उन अंधेरों में डूबा रहता ?
सो मैंने भगवान से प्रार्थना की,
उनसे दो और हाथों की कामना की |
उन्होंने कहा -
मुझे पता है
तू दो और हाथों का क्या करेगा |
इन उड़ती तितलियों में से 
कुछ और को क़ैद करेगा |
मगर ये तितलियाँ
यूँ ही अपने पंख फड़फड़ाती रहेंगी |
तुझे दो और हाथ पाने के लिए
ललचाती रहेंगी |

मैं अपनी 'बंद मुट्ठियों' के साथ 
आज भी उसकी चौखट पे पड़ा हूँ,
और 
उड़ती तितलियों के सामने 
बेबस खड़ा हूँ |

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नवम्बर , 1993
राकेश कुमार त्रिपाठी 



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