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मेरा लिखना ...

सनक थी,
पागलपन, एक दीवानापन सा !
मेरी नज़रों के आगे
सारी दुनिया खड़ी रही
एक छतरी के नीचे ..... सूखी !!
मैं रेगिस्तान की बारीश में, 
भींगता रहा देर तक ...................

जुनून था,
जोश, एक वहशीपन सा !
मेरी नज़रों के आगे
सारी दुनिया आराम करती रही 
मुफ़्त के धर्मशालों में !!
मैं ठहरी हुई ज़मीन पर,
भागता रहा देर तक .................

आशा थी,
उमंग, एक आवारगी सी !
मेरी नज़रों के आगे 
सारी दुनिया ताले लगाए रही
अपनी बंद मुट्ठियों पर !!
मैं खुले मैदानों में मरीचिका,
ढूँढ़ता रहा देर तक ...............

भींगता रहा ....
भागता रहा .... 
ढूँढ़ता रहा ....

भीगा बदन था ....
थके क़दम, आँखें बोझिल सी !
मेरी नज़रों के आगे 
सारी दुनिया नज़रें चुराती रही
खुली किताबों से !!
मैं लगभग भरे हुए पन्नों के हाशिये पर,
लिखता रहा देर तक ..... 


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अप्रैल, 1992
राकेश कुमार त्रिपाठी 




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