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Deemak

Deemak - a story by Rakesh Kumar Tripathi



दीमक

खटिया को उठाते समय फिर से उसने देखा, पाए के पास हल्के पीले रंग का चूरा गिरा हुआ है । खटिया को उसने थोड़ा सा उठा कर धीरे से ज़मीन पर पटका । उसे लगा जैसे पाए के अंदर से कहीं से थोड़ा सा चूरा झड़ कर हवा में खो गया । वह चूरा तो ठीक से दिखा भी नहीं और ज़मीन पर का चूरा भी इस झटके के कारण उड़ गया । खटिए के किसी भी पाए में अभी तक कोई सूराख या दरार स्पष्ट रूप से दिखी तो नहीं थी, लेकिन उसे बहुत दिनों से .... नहीं महीनों से ... या फिर सालों से ऐस लग रहा था कि खटिए का कोई पाया या सभी पाए कमज़ोर हो रहे हैं । रात में सोते हुए करवट बदलते समय या दिन को करवट बदलते हुए लेटते समय उसे लगता था कि पाए के अंदर से आवाज़ आ रही है । कोई उसकी लकड़ी को खुरच रहा है, कुतर रहा है, चाट रहा है और उसकी खटिया के पाए अंदर ही अंदर खोखले होते जा रहे हैं । बहुत दिनों से वह गौर कर रहा था कि पाए के पास यह चूरा जमा हो जाता है । उसे लग रहा था कि उसकी खटिया के पायों में दीमक लग चुके हैं । 

पता नहीं दीमक खटिया में लगे थे या उसके मन में । खटिए की जाँच वह ख़ुद कर सकता था, अपने मन की जाँच वह किससे करवाता ? खटिए से गिरते हुए चूरे उसे दिखते थे, लेकिन मन में से तो कोई चूरा नहीं निकलता । मन में से तो आह निकलती है । किसे दिखाता वह अपनी आह ? झोंपड़ी के कोने में चटाई पर पड़ी बार-बार अपना पेट दबाकर कराहती अपनी पत्नी को या अपने तीन साल के पोते को ?

ज़िला गढ़वा में रहता था सत्तो । कभी पलामू ज़िले  में पड़ता था उसका गाँव । कभी बिहार में हुआ करता था उसका गाँव । फिर कैसे वह बिहार में ना रहकर झारखंड में आ गया, कब गढ़वा में आ गया, सत्तो को समझ में नहीं आया । वह सुनता था लेकिन समझ नहीं पाता था । उसकी समझ में बस इतना आता था कि कल घर में क्या खाना बनेगा इसका इंतज़ाम करना है ... और यह बात कोई नई नहीं है । यह संघर्ष उसके पैदा होने से पहले से चल रहा था जिसका नायक उसका पिता था । सत्तो को कभी कभी लगता था कि उसके गाँव में बहुत सारे लोगों को कभी किसी ने अभिशाप दिया था कि कोई अपने बाप की ऊँगली थाम कर चलना नहीं सीख पाएगा । खुद उसकी उम्र जब दो-ढाई साल की थी, उसका बाप साँप के काटने से मर गया था । गाँव के लोग उसे लेकर गढ़वा के अस्पताल भी गए थे लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी । इतनी देर कि उसके बाप के मुँह से निकलने वाला झाग भी सूख गया था । ऐसा गाँव के गिने-चुने बुज़ुर्गों ने उसे बताया था । गाँव के गिने चुने लोग ही अपने बालों को सफ़ेद होता देख पाते थे या चमड़ी को सिकुड़ते हुए । वैसे भी जिन लोगों के साथ ऐसा होता था वह भी काफ़ी देर से होता था । शहर में रहने वाले शायद आमतौर पर समझ नहीं पाएँगे कि सत्तर साल के जुगना का एक भी दाँत अब तक टूटा क्यों नहीं है या फिर साठ का हो चुका परभु जब जंगल से लकड़ी काट कर उसका गट्ठर अपने सर पर लादे जंगल से वापस आता है तो उसके बाँहों को मछलियाँ ऐसी तनी रहतीं है कि उन्हें देखकर रुपहले पर्दे के वह सितारे भी शर्मा जाएँ जो वातानुकुलित कमरों में बैठकर लाखों की कीमत वाले उपकरणों की सहायता से अपने शरीर को सुडौल बनाते हैं और थक जाते हैं तो आयातित प्रोटीन ड्रिंक पीते हैं । सिगनौरा के लोगों को तो दो जून का खाना भी ढंग से नसीब नहीं होता । 
सिगनौरा का इतिहास भी बहुत पुराना नहीं है ।  कोयल नदी पर चालीस साल पहले बाँध बनने का काम शुरू हुआ था । उस बाँध की डूब क्षेत्र में जो गाँव आने वाले थे उन्हें कहीं और जाना पड़ा ।  सिगनौरा तभी का बसा हुआ गाँव है । या हो सकता है उसके पहले भी रहा हो लेकिन अब इस गाँव में वही लोग हैं जो विस्थापित हुए थे । सरकारी आँकड़ों के मुताबिक ज़्यादातर लोगों को मुआवज़ा मिल चुका था । उन्नीस सौ नब्बे के आसपास की बात है सत्तो के दादा छाती पीट पीट कर नाचने लगे - बंद हो गया... काम बंद हो गया । वो किसी काम से डाल्टनगंज गए थे । वहीं से सुनकर आए थे कि बाँध जो लगभग पूरा बन चुका है, उसका काम रुक गया है । सत्तो के दादा की खुशी का ठिकाना ना था । लोग मना कर रहे थे ऐसे मत करो । लेकिन वो रुके नहीं । खुश ऐसे हो रहे थे मानों उन्हीं की बद्दुआ के कारण उस बाँध का काम रुका हो । दूसरे दिन सुबह लोगों को वह बेहोश मिले थे गाँव की बरगद के पास । सब लेकर गए अस्पताल । डॉक्टरों ने कहा दिल का दौरा पड़ा था । 
सत्तो भी गया था । पहली बार डाल्टनगंज जैसा बड़ा शहर देखा था । अपने बेहोश दादा को लेकर आया था लेकिन मन ही मन सोच रहा था कि अपनी नई ब्याहता दुल्हन को भी लेकर आएगा कभी । लेकिन वह मौक़ा पिछले पच्चीस सालों में अब तक नहीं आया । हालाँकि सत्तो उसके बाद भी दो बार आया था डाल्टनगंज । एक बार जब सिरसा की घरवाली को बच्चा होने वाला था और दूसरी बार .....जब उसका बेटा मरा था, वहीं  डाल्टनगंज में । उसके बाद वह अपने गाँव की सीमा से ही बाहर नहीं निकला । 

गाँव की सीमा से बाहर निकलना भी एक दुष्कर कार्य था ।  एक तरफ़ लातेहार का जंगल । सिगनौरा और आसपास के गाँव के कितने ही लोग उस जंगल के जंगली जानवरों का शिकार बन गए थे । हिंसक पशु कभी कभी गाँव की सरहद तक भी आ जाते थे । पिछले कई सालों से वहाँ माओवादियों, नक्सलवादियों का गढ़ भी बन गया था । कारण जो भी रहा हो, गाँव के लोगों को अगर शहर की तरफ़  जाना होता था तो या तो पश्चिम में गढ़वा जाते थे या पूरब की तरफ़ कोयल नदी पार करके डाल्टनगंज । और तीस किलोमीटर के बस के सफर की शुरुआत करने के लिए उन्हें दोनों ही तरफ़ बारह किलोमीटर पैदल चलकर, दो छोटी नदियों को पैदल पार कर राजकीय मुख्य मार्ग तक आना पड़ता था । बरसात में  तो उन नदियों में छाती या गले तक पानी आ जाता था । ऐसे में अगर किसी को बड़े डॉक्टर या अस्पताल की ज़रूरत पड़ गई तो छ-आठ लोग इकट्ठा होकर खटिया पर लादकर मरीज़ को लेकर जाते थे । जब तक रोग छोटा या मामूली लगता था मरीज़ गाँव के कुल देवता से गुहार करता रहता और मर जाता । कितने ही जवान लोग साँप-बिच्छु, जंगली जानवरों के आक्रमण से मारे गए । कुछ लोग डायरिया की चपेट में आ गए । और जो जवान बच गए वो जंगलों में जाकर गुम हो गए ... बंदूक उठाकर अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए ।

सत्तो ने खटिया उठाकर धूप में रख दी । शायद दिनभर धूप लग जाए तो अंदर जो कीड़े हैं वह मर जाएँ । फिर वह मैदान के लिए जंगल की  तरफ़ चला गया । वहाँ उसे बार-बार खटका लग रहा था कि कि उसका पोता दिवाकर खेलते खेलते खटिया को गिरा ना दे । दिवाकर नाम उसके बेटे ने रखा था । कहता था दिवाकर का मतलब सूरज । हमारे लोगों को नए सूरज की ही ज़रूरत है । वैसे तो गाँव के बच्चे चार किलोमीटर दूर के प्राथमिक विद्यालय जाकर चौथी-पाँचवीं तक पढ़ पाते थे । सत्तो का बेटा गिरि भी उतना ही पढ़ पाया था लेकिन किशोर अवस्था में जाकर अपने साथी लोगों के साथ मिलकर पता नहीं कहाँ कहाँ की किताबें पढ़ने लगा और अजीब अजीब बातें करने लगा जो सत्तो को और उसकी पत्नी की समझ में कभी नहीं आईं । दोनों को लगातर डर लगा रहता था क्योंकि गिरि का जंगल में आना जाना बढ़ गया था । पहले तो शाम तक लौट आया करता था, फिर रात-रात भर गायब रहने लगा और कभी-कभी तो दो-तीन दिन बाद लौटता । पूछने पर कहता एक लंबी लड़ाई लड़नी है । उसकी माँ पूछती किससे ! कहता सिस्टम से... जिसमें अंदर तक घुन लगा हुआ है । 

पता नहीं माँ की मान मनौवल थी, अनुनय विनय था या जवान लडके की आँखों में फौरन बस गई उस लड़की की सूरत जिसे बड़ी चालाकी से उसके चाचा ने मेले में दिखाया था । गिरि ब्याह के लिए राज़ी हो गया । लेकिन जवानी के दिनों में शरीर में उठने वाली तरंगे उसके मन की तरंगों के आगे जल्द ही फीकी पड़ गईं और वह फिर कई-कई दिनों तक घर नहीं लौटता । सत्तो अपनी डेढ़ बीघा ज़मीन पर दिन-रात मेहनत करके परिवार का पेट भरता । उसकी पत्नी जंगल के सामने वाले हिस्से से तेंदु पत्ते चुन कर लाती, जिसे शहर से महाजन हफ़्ते में एक बार आकर ले जाता । गाँव में किसी को कुछ सामान चाहिए होता था तो वही महाजन ला देता था ।  बाहरी दुनिया से यह सिगनौरा अलग थलग ही रह जाता । फिर समय बीता और गिरि की पत्नी का पैर भारी हुआ । सत्तो ने सोचा कि शायद बच्चा होने के बाद गिरिया घर में टिकेगा, गृहस्थी में मन लगाएगा लेकिन बच्चे के प्रसव के समय ही गिरि की पत्नी चल बसी । नन्हें से शिशु को देखकर भी गिरि घर में नहीं टिका । पहली बार ऐसा हुआ था कि वो पन्द्रह दिन तक घर नहीं लौटा । गनेस बता रहा था कि उसकी पत्नी को जलाकर जब सब गाँव लौट रहे थे तो धीरेन चाचा ने कहा था कि अगर अस्पताल पहुँच जाती समय से तो बच जाती गिरि की औरत । शहर में इससे भी खराब हालत में जच्चा-बच्चा दोनों अस्पताल से हँसते-खेलते लौट आते हैं । गिरि उसके अगले दिन ही चला गया और पन्द्रह दिन बाद लौटा और उसके बाद तो महीनों तक घर नहीं आता । नन्हें पोते को लेकर सत्तो और उसकी पत्नी ने अपनी नई दुनिया शुरू की । अब वह पोता दिवाकर तीन साल का था और बहुत शरारती हो चला था । कभी इस पेड़ की डाल से लटकता कभी खटिया पे चढ़कर नीचे छलांग लगाता । सत्तो जल्दी से लौटा तो देखा खटिया अपनी जगह खड़ी है लेकिन धूप थोड़ी खिसक गई है और बेल के पेड़ की छाया खटिया के एक हिस्से पर पड़ रही है । उसने खटिया को थोड़ा सा और खिसका दिया । जहाँ से खटिया खिसकाई थी वहाँ एक चुटकी लकड़ी का महीन बुरादा पड़ा हुआ था ।

दिवाकर वैसे तो दिनभर इधर उधर खेलता रहता । भूख लगती तो अपनी दादी के पास आकर खा जाता । सत्तो की पत्नी पेट के दर्द को दाँतों से दबाए उसके लिए रोटी सेंक देती । तीन-चार महीने हो गए उसका पेट का दर्द बढ़ता ही जा रहा था । सत्तो ने कहा था चलो डाल्टनगंज या गढ़वा जाकर सरकारी अस्पताल में दिखा लाता हूँ । लेकिन शुरू-शुरू में तो वह टालती रही । गनेस को भेजकर जंगल से लाल-पीले पत्तों वाला पौधा जड़ समेत मँगवा लिया और पीस के पी लिया । सत्तो से कहा कि सब ठीक हो गया । लेकिन सत्तो को एक महीन बाद पता चला कि दर्द वैसे ही था । और तभी डाल्टनगंज से आए महाजन ने खबर भिजवाई कि गिरि दस दिन से थाने में बंद है । सत्तो जुगना को लेकर डाल्टनगंज गया था । उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ था कि बारह किलोमीटर का पैदल रास्ता और दो घंटे बाद आई बस से तीस किलोमीटर का सफर  कितना लंबा हो गया है । घर पर अपनी पत्नी को कुछ नहीं बताया था, कहा था जिगना को अस्पताल में जाँच करवानी है, तेरे लिए भी पूछ कर दवा लेता आऊँगा । 

पूरे पाँच दिन सत्तो इस थाने से उस थाने, इस अफ़सर के पास से उस अफ़सर, इस नेता के पास से उस नेता तक भटकता रहा लेकिन गिरि का पता नहीं चला । लेकिन जिस भी थाने में वह गिरि के बारे में पूछता उसे लगता जैसे थाने की दीवारें कुछ कहना चाहती हों लेकिन पुलिस वाले की ज़ुबान खामोश रहती । उसे लगता जैसे दरवाज़े पर खड़े सिपाही की बंदूक के कुंदे को पता है लेकिन दारोगा इनकार में सर हिला देता । गिरि के कुछ साथी भी उसकी तलाश में भटक रहे थे लेकिन छिप छिप कर । सत्तो को उन्हीं से पता चला कि गिरि यहाँ आत्माराम से मिलने आया था । आत्माराम यानी डाल्टनगंज का पूर्व विधायक । ऐसे तो खुलेआम या विधानसभा में आत्माराम भी नक्सलियों का विरोध करता लेकिन सत्तो को गिरि के साथियों ने बताया कि आत्माराम दरअसल उनकी मदद करता था और बदले में वे लोग उसकी पार्टी फ़ंड के लिए चंदा देते थे । गिरि चंदे की रकम लेकर ही डाल्टनगंज आया था और बस स्टैंड पर उसे पुलिस ने पकड़ लिया था । थाने में हालाँकि कोई गिरफ़्तारी दर्ज़ नहीं थी । सत्तो बड़ी मुश्किल से आत्माराम से मिला । आत्माराम ने तो पहले किसी गिरि को पहचानने से ही इनकार कर दिया, बाद में गिरि के साथियों के पास उसका संदेश आया कि वह इस मामले में अगर खुल कर साथ देगा और गिरि को खोजने में मदद करेगा तो उसके लिए बाद में छिप कर भी उनकी मदद करना मुश्किल हो जाएगा । गिरि के साथियों ने सत्तो को समझाया कि आप गिरि को मत खोजिए, वह मिल जाएगा ।

गिरि नहीं मिला, उसकी लाश मिली थी - रेलवे लाईन के किनारे दो टुकड़ों में बँटी हुई । देखने वालों ने बताया कि उसके शरीर पर और भी बहुत सारे चोटों के निशान थे । पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से पता चला कि उसने दुर्घटना वाले दिन बहुत सी शराब पी रखी थी । उधड़े हुए पेट और  फटी हुई खोपड़ी वाले अपने बेटे को लेकर सत्तो गाँव नहीं लौटा । वहीं डाल्टनगंज में उसका अंतिम संस्कार कर दिया । घर लौटकर किसी किस्से-कहानी की तरह गिरि के मरने की खबर पत्नी को सुना दी । शायद पत्नी को गाँव के किसी से यह खबर पहले ही मिल चुकी थी । उसकी आँखों से एक बूँद आँसू गिरना तो दूर, उसकी पलकें तक नहीं भीगी । सत्तो देर तक बार-बार किसी बहाने से झोंपड़ी के अंदर आता और अपनी पत्नी की आँखों की ओर देखता । हर बार उसे एक वीराना और सूनापन मिलता । दुख का वहाँ नामोनिशान भी नहीं था ।

सत्तो की आँखों के सामने उसका बाप मरा, दादा मरा, बहू मरी, बेटा भी मरा । अब पता नहीं पत्नी के पेट में कौन सा पिशाच बैठा है । अगर उसे कुछ हो गया तो वह अकेले अपने पोते को कैसे सम्हालेगा ! उसने अपने जीवन में जो भी मौतें देखीं थीं, सब अचानक हुई थी और अचानक ही उसकी ज़िंदगी का एक हिस्सा कट कर अलग हो गया । अपनी पत्नी को मानो वह रोज़ मौत की तरफ़ बढ़ते देख रहा था । सब उसे समझाते कि कुछ नहीं, पेट दर्द है, ठीक हो जाएगा । उसकी पत्नी भी कहती कि बेकार में चिंता मत करो, हमको कुछ नहीं होगा लेकिन सत्तो को अंदर ही अंदर लगता कि ये बीमारी उसकी पत्नी को उससे छीन कर ही दूर होगी । वह रोज़ महसूस करता कि उसकी पत्नी के चेहरे पर पीड़ा की रेखाएँ और गहरी होती जा रही हैं । उसने सोच लिया था कि कैसे भी हो वह बारीश शुरू होने से पहले उसे लेकर सरकारी अस्पताल जाएगा । एक बार बारीश शुरू हो गई और नदी में पानी बढ़ गया तो बहुत दिक्कत होगी । नदी को ऐसे ही पार करना मुश्किल होता है, साथ में मरीज़ हो तो खटिया को सर के भी ऊपर रखना होगा । 

सत्तो जब भी खटिया के बारे में सोचता उसे याद आ जाता कि उसमें दीमक लग चुका है । उसे अब डर सता रहा था कि अगर इस खटिया पर वह अपनी पत्नी को लेकर जाएगा तो कभी भी अस्पताल नहीं पहुँच पाएगा । खटिया के पाए कभी भी धोखा दे सकते हैं । उसके जीवन की दुखद घटनाओं ने, उसके अभावों ने, उसकी गरीबी ने, उसके गाँव के पिछड़ेपन ने उसे कभी इतना निराश नहीं किया  था जितना अब एक खटिया में लगे दीमकों ने कर दिया था ।

इस साल उम्मीद से पहले ही बारीश हो गई । और पहले ही दिन ऐसी मूसलाधार बारीश हुई कि लगा झोंपड़ी की छत ही ना टूट जाए । अचानक हुई बारीश में ना घर की छत ठीक कर पाया था सत्तो ना घर के सामने वाले मेंड़ पर मिट्टी चढ़ा पाया था । घर के सामने पानी जम गया था । जब बारीश रुकी तब सामने कीचड़ ही कीचड़ । सत्तो ने पहला काम किया था खटिया को उठाकर अंदर रख दिया था । अगली सुबह मैदान से लौटने समय सत्तो सोच रहा था कि आज ज़्यादा काम करना पड़ेगा । गनेस को खबर भिजवाई कि वह छत को ठीक करने में आकर थोड़ी मदद कर जाए । गनेस को आने में देर लगते देख वह अकेला ही ऊपर चढ़ा । सुबह से उसकी पत्नी भी भली-चंगी होकर घर का काम कर रही थी । लग ही नहीं रहा था कि उसे कोई बीमारी भी है । उसी ने खटिए को बाहर धूप में रखा था । खाना बना लिया था और घर का सारा भीगा हुआ सामान बाहर धूप में रख कर अब छज्जा छाने में पति की मदद के लिए तत्पर खड़ी थी । पोता भी दौड़ दौड़ कर ताड़ के छोटे छोटे पत्ते बढ़ाने की कोशिश कर रहा था । सत्तो ने पत्तों को एक के ऊपर एक बिछाते हुए सोचा कि सब कुछ नहीं गया, उसके पास जीवन का संबल अभी भी है ।
नीचे देखा तो दिवाकर बबूल की झाड़ियों के पास दिखा । एक तितली को पकड़ने की कोशिश कर रहा था । तभी सत्तो ने देखा उससे कुछ दूरी पर ही एक बड़ा सा नाग कुंडली मारे बैठा है और दिवाकर तितली का पीछा करते करते एकदम उसके सामने जा पहुँचा है । सत्तो चीखते हुए छत से नीचे उतरने लगा, पैर किसी चीज़ में फँसा और वो बहुत सारे पत्तों के साथ नीचे गिरा । गिरते ही उठकर सामने लपका लेकिन तभी उसका पैर फिसला और वो धड़ाम से फिर ज़मीन पर गिरा । इस बार उसका हाथ दाँव पर पड़ा, जो उसी ने वहाँ पत्ते काट कर रखा था, दाँव सीधा हो गया और सीधा उसकी गर्दन में धँस गया ।

 गाँव के लोग जमा हो गए । सामने पड़ी खटिया पर सत्तो को लिटाया गया । किसी ने एक कपड़े से उसकी गर्दन को बाँध दिया । थोड़ी ही देर में वह कपड़ा खून से तरबतर हो गया तो कुछ और पुराने कपड़े साथ में रख लिए गए । आठ-नौ आदमी उस खटिया को उठाकर चल दिए । काफ़ी लंबा रास्ता तय करना था । दिवाकर को गनेस की घरवाली के हवाले कर के सत्तो की पत्नी भी पीछे पीछे चल दी । लोग मना करते रहे लेकिन उसने किसी की ना सुनी । नदी में घुटनों तक का पानी था । सब ने अपनी धोती-पैजामा-पतलून को मोड़ने के लिए खटिए को नीचे रखा ।

सत्तो ने पहली बार आँख खोल कर देखा । उसकी गर्दन एक तरफ़ लुढ़की हुई थी । उसने इशारे से अपनी पत्नी को पास बुलाया और घरघराती हुई आवाज़ में कहा ।
- ये खटिया शहर ना पहुँच पाएगी । बदल दे इसे । इसमें दीमक लग गया है ।
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